पीस पार्टी

हमारा नेतृत्व


नया लक्ष्य, नयी उड़ान, नयी मंजिल

एक डाक्टर के तौर पर मरीज़ को शिफा देने का काम तो वह कर सकते थे लेकिन बीमार मुल्क को ‘‘शिफा’’ देने के लिए नये रास्ते की खोज में निकल पड़े। नई संस्कृति में छुआ-छूत और भेद भाव को साथ ले कर चलने वाली दुनिया सामने थी। एक दुनिया दंगे और फसाद की भी थी। यहां देखते ही देखते मुल्क के आसमान पर धुंए के बादल मंडराने लगते थे। डा0 मो0 अय्यूब ने गहराई से इस दुनिया की समीक्षा की थी। वो इस नतीजे पर पहुंचे थे कि अब इस नई और बीमार दुनिया की सर्जरी जरूरी है। यहां घूसखोरी है। जातिवाद है। फिरकापरस्ती है। मंजिल पर आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि ये हालात बदले जायें। यही रास्ता था जिससे मुल्क को शिफा मिल सकती थी। जिस रास्ते से वह काफी दूर खड़े थे। उन्होंने तहैया किया कि इस मर्ज का खात्मा जरूरी है और यह रास्ता जो सियासत की ओर ले जाता है, पर चलना ही पड़ेगा। एक सड़ी-गली सियासत की ओर ले जाता है, पर चलना ही पड़ेगा। एक सडी-गली सियासत सामने थी और इस सियासत में वह आज़ादी के बाद की लगभग तमाम पार्टियों का ‘कारनामा’ देख चुके थे। मंजिल दुशवार थी। पहला सवाल तो यही था कि क्या उन्हें कामयाबी मिलेगी? क्या लोग उनके विचारों के साथ जुड़ना पसंद करेंगे? फिर उन्हें रवीन्द्र नाथ टैगोर की पंक्तियां याद आई। ‘‘एकला चलो रे’’ उन्हें सूफी-संतों की हिकायतें याद आईं। ‘‘आप सच के रास्ते पर चलते हैं तो अकेले होते हैं। फिर एक दुनिया आपके साथ हो जाती है।’’ अमनो-अमान के इस मुजाहिद ने इसी फिक्र के साथ पीस पार्टी की बुनियाद रखी और भारतीय राजनीति के अध्याय में एक नये अध्याय की शुरूआत कर दी। एक नया अध्याय, जहां सिर्फ रोशनी हो। लोग मिलजुल कर रहते हों। दलितों और अकलियतों का इस्तेमाल (शोषण) न होता हो। किसी कौम को शक की निगाहों से ना देखा जाता हो।

भारतीय राजनीति में ये तजुर्बा पहली बार हुआ था।

डाॅ0 मोहम्मद अय्यूब, राष्ट्रीय अध्यक्ष, पीस पार्टी

जीवन-परिचय

डाॅ0 मुहम्मद अय्यूब की जिंदगी एक खुली हुई किताब की तरह है। एक ऐसी किताब, जिसे आसानी से पढ़ा और समझा जा सकता है। यहां जिंदगी की जद्दोजहद भी है, मजबूत इरादे भी और आसमान की बुलंदियों को छू लेने की ख्वाहिश भी। लेकिन यह सब कुछ बहुत आसानी से डाॅ0 मुहम्मद अय्यूब को जिं़दगी में नहीं मिला। बचपन मुफ़लिसी की आगोश में गुजरा लेकिन नन्हे अय्यूब और उनके वालिदैन को पता था कि तालीम ही तरक्की और कामयाबी की कुंजी होती है। नन्हे अय्यूब का दिल उस वक्त भी खेल-कूद में नहीं लगता था। वो तालीम के रास्ते अपनी जिंदगी को एक नई पहचान देना चाहते थे। एक ऐसी पहचान, जहां आम इंसानों का दर्द उनके अपने दर्द में शामिल हो जाये। अभी देश की आज़ादी को कुछ ही बरस गुजरे थे। मुफ़लिसी की तंग गलियों और अंधेरों से गुजरने वाले अय्यूब ने तब ही सोच लिया था- ‘बचपन को गंवाना नहीं है। मंजिल को पाना है तो अभी से सितारों पर कमंद डालने का हुनर सीखना होगा। सबको साथ लेकर चलना होगा।’ और आने वाले समय में, इसी विचार ने तरक्की और कामयाबी के तमाम रास्ते खोल दिये थे।

जन्म व बुनियादी तालीम

आज़ादी के बाद बुनकरों की हालत खराब थी। ज़्यादातर बुनकर आर्थिक समस्याओं से दो-चार थे। समय 1 जनवरी, 1956। बड़हलगंज के एक गैर तालीम याफता बुनकर खानदान में डाॅ0 मो0 अय्यूब का जन्म हुआ। पिता का नाम था, आशिक अली और मां का, जोहरा खातून। आशिक अली का खानदान रोजगार के लिए बुनाई पर ही आश्रित था। घर की परेशानियों और मुफलिसी के बावजूद बेटे की लगन को देख कर मां-बाप ने उसे पढ़ाने का इरादा किया। शुरूआती तालीम के लिए मकामी मदरसे में दाखिला हो गया। यहां मो0 अय्यूब ने पांचवीं तक की पढ़ाई मुकम्मल की। साथ ही नन्ही उम्र से ही, मां-बाप के कामों में हाथ बटाना भी शुरू कर दिया। आगे की तालीम के लिए अय्यूब का दाखिला नेशनल इण्टर काॅलेज बड़हलगंज में कराया गया। किसे खबर थी कि हाई स्कूल में सिर्फ 38 फीसदी और इण्टर के इम्तेहान में एक बार फेल हो कर दूसरी बार सिर्फ 51 फीसदी अंक पाने वाला यह लड़का एक ऐसी मिसाल पेश करेगा जिस पर आने वाली दुनिया गर्व करेगी। ये डा0 मुहम्मद अय्यूब की लगन और मेहनत थी कि उन्होंने नाकामयाबी से घबराना नहीं सीखा था। वो जानते थे कि हार, जीत की पहली मंजिल भी है।

  1. उच्च शिक्षा (आला तालीम)
  2. कोई कााबिल हो तो हम शान कई देते हैं
  3. ढूंढने वालों को दुनिया भी नई देते हैं
अल्लामा इक़बाल

कहते है मंजिल पर नज़र हो, इरादे नेक हों तो अल्लाह भी साथ देता है। तालीम में रूकावटें पैदा हुईं तो साथ देने वाले भी पैदा हो गये। उनके वालिद के मोहसिन, एडवोकेट श्री राजवंशी त्रिपाठी की हौसला अफ़जाई ने युवा मो0 अय्यूब की मदद की। इवनिंग क्रिश्चन काॅलेज (इलाहाबाद) में आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला मिल गया। मो0 अय्यूब की लगन और मेहनत काम आई। तरक्की के जीने खुलते चले गए। 1976 में के जी मेडिकल काॅलेज लखनऊ व इन्स्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइन्सेस वाराणसी दोनों में चयन हुआ जिसमें इन्स्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइन्सेस वाराणसी में दाखिला लिया। एक नई सुबह की शुरूआत हो गई थी। कामयाबी का एक नया सूरज क्षितिज में आहिस्ता-आहिस्ता तुलूअ हो रहा था। 1984 में एम. एस. (सर्जरी) की डिग्री हासिल कर मुहम्मद अय्यूब अब डाॅक्टर मुहम्मद अय्यूब के तमगे के साथ खड़ा था। स्कूल में क्लास का कमजोर कहा जाने वाला बच्चा अब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के टाॅपरों में शामिल था। वर्ष 1983 में आई.ए.एस (एलाइड) में कामयाबी हासिल कर 1985 में कस्टम विभाग में नियुक्ति हो गयी जिसे छः महीने बाद ही छोड़ दिया, लेकिन तालीम की कमी की वजह से, पिछड़ गये अपने जैसे हजारों परिवारों को समाज के साथ आगे बढ़ाने के इरादे ने साथ नहीं छोड़ा। समाज के पिछड़े, गरीब व मजलूम तबके की तरक्की और उसे इंसाफ दिलाने के लिये एक सामाजिक तंजीम ‘माईनारिटीज आॅर्गानाईजेशन फार सोशल डेवलपमेंट एण्ड इन्टिग्रेशन बड़हलगंज’ की बुनियाद डाली। इसमें शरीक बने, बी जेड अंसारी, डाॅ0 शमीम आबिदी, इकबाल अहमद, यूसुफ सिद्दीकी, एम वाई. सैमुअल। इस तंजीम ने माकमी सतह पर समाज के पिछड़े वर्ग को आगे बढ़ाने के लिये तमाम काम किये। गरीब तबके के लोगों को मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध कराना, रोजगार के लिये माईकोलोनिंग, साफ-सफाई के लिये मुहिम वगैरा। इस तबके के पिछड़ेपन की सबसे बड़ी वजह असरी (आधुनिक) तालीम की कमी थी। इसे देखते हुए ‘फातिमा किड्स कान्वेंट’ की स्थापना की गई, ताकि शुरूआती दौर से ही गरीब व पिछड़े तबके के लोगों को असरी (आधुनिक) तालीम आसानी से मुहैया करायी जा सके। आज अपने इस मिशन को लेकर फातिमा किड्स कान्वेंट, ‘फातिमा गल्र्स जूनियर हाई स्कूल’ में बदल चुका है।

आगे का सफर

फिर शुरू हुआ, अंधेरे बादलों से गुजरते हुए, कामयाबी का नया इतिहास लिखने की तैयारी। एक नई दुनिया उनके सामने थी। ज़ख्मों से भरी हुई दुनिया, एक डाॅक्टर के रूप में सेवा ही लक्ष्य बना वह सिविल सर्वेसेज की उस दुनिया को भी देख आये थे जहां हर सीढ़ी पर भ्रष्टाचार के पुतले रखे थे। डाक्टर तो कोई भी बन सकता है लेकिन डा0 मो0 अय्यूब की तरह बड़ा लक्ष्य सबके पास नहीं होता। वो अपने आबाई वतन बड़हलगंज में सिसकते हुए उन गरीब बीमार लोगों का अंजाम भी देख चुके थे जिनकी जिंदगी पैसे के अभाव में अज़ाब बन जाती है। जिनके पास अपना और अपने बीवी बच्चों का इलाज कराने के भी पैसे नहीं होते। जिनके अजी़ज़, रिश्तेदार, चाहने वाले अच्छा अस्पताल न होने के कारण देखते ही देखते मौत क आगोश में पहुंच जाते थे। वालिदा से बेहद मोहब्बत करने वाले डाॅ0 मो0 अय्यूब ने सोच रखा था, अब इसी सरज़मीन पर एक अस्पताल बनेगा और ये अस्पताल मां की यादगार होगा। बड़हलगंज में अब कोई भी ऐसा नहीं होगा जो गुर्बत के कारण अपनी बीमारी का इलाज न करा सके। बड़हलगंज की वादियों में यह एक मसीहा का जन्म था। देखते ही देखते वालिदा के नाम पर ज़ोहरा अस्पताल की बुनियाद रख दी गई। 1985 में सिर्फ तीन कमरों के अस्पताल से शुरू हुआ ज़ोहरा अस्पताल आज माॅडर्न सहूलियतों के साथ 100 बेड के कामयाब अस्पताल में बदल चुका है। जहां कम से कम 100 परिवारों को रोजगार भी मिल रहा है। अपनी तरह का यह एक अकेला अस्पताल भी है जहां इलाज शुरू करते समय मरीज से एडवांस के रूप में कोई रकम नहीं ली जाती। ताकि पैसों की कमी से कोई गरीब-बीमार, इलाज से महरूम न रह जाये। मरीजों की मुसलसल 28 सालों की खि़दमात से अल्लाह ने जहां डाॅ0 मो0 अय्यूब को बेशुमार दौलत और शोहरत से नवाज़ा, वही दो लाख से ज़्यादा बड़े व पचास हज़ार से ज़्यादा छोटे आॅपरेशनों को करने में कामयाबी हासिल कर, डाॅ0 मो0 अय्यूब ने एक रिकाॅर्ड भी कायम किया, जो दुनिया में किसी भी सर्जन के लिये नामुम्किन है। सधे हाथों के कमाल से डाॅ0 मो0 अय्यूब कठिन मानी जाने वाली पित्त की थैली का आॅप्रेशन पांच मिनट के समय में ही करने का कारनामा अंजाम दे चुके हैं। जो अपने आप में एक विश्व रिकाॅर्ड है।

कठिन राहें, मज़बूत इरादे

ज़ोरा अस्पताल की बुनियाद के बाद भी बड़हलगंज में डाॅ0 मो0 अय्यूब की राह इतनी आसान नहीं थी। एक दुनिया सफेद पोश और खुदगर्ज लोगों से घिरी थी। आई. ए. एस. जैसी नौकरी को छोड़ पिछड़े इलाके में अलाज मुहैया कराने के साथ समाज में अमन व अमान कायम करने के लिये डाॅ0 मो0 अय्यूब ने ठान लिया। इस मसले की तह में जाने पर उन्होंने पाया कि समाज में मज़हबी और मसलकी तबकों के बीच दूरियां, तालीम की कमी और अंधविश्वास के कारण है। गरीबी से हालात नहीं सुधर पा रहे हैं। सबसे पहले उन्होंने समाज के बाअसर लोगों से मशवरा कर इन हालात को बदलने की कोशिश शुरू की। कस्बे के माली और तालीमी रूप में सबसे पिछड़े गोला मुहल्ला को गोद लेकर डाॅ0 मो0 अय्यूब ने वहां साफ सफाई और तालीम की बढ़ौत्तरी का काम शुरू कराने के साथ, बेरोजगारों को बिना सूद के माइकोलोन मुहैया करा कर स्वरोजगार को बढ़ावा दिया। अब उन्होंने मुस्लिम तबके के दो मसलकों के बीच फौजदारी के मुकदमों को खत्म करा कर बेगुनाहों को राहत दिलाने का कार्य किया। इनके बीच के मसलों को खत्म कराने के लिये वह आज भी लगे हुए हैं। डाॅ0 मो0 अय्यूब के कारण ही फिरकों के नाम पर आपस में लड़ रहा मुस्लिम समाज आज मिलजुल कर रह रहा है। अब बारी थी, मुसलमानों और हिंदुओं के बीच की दूरी को कम करने के प्रयास की। इसके लिये डाॅ0 मो0 अय्यूब ने विश्वमोहन प्रसाद, डाॅ0 परमहंस सिंह, झगरू गौड़, स्व, सदानंद जायसवाल, महेश उमर आदि से सहयोग लेकर दोनों समाज के बीच फैली आपसी रंजिश को खत्म कर आपसी एतमाद व एतबार कायम करने का काम किया। हिन्दू मुसलमानों के बीच आपसी भाईचारगी को बढ़ावा देने के लिये सरयू तट पर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 29 से हिंदुओं के शमशान और मुसलमानों के शहीद बीबी सरवर बाबा मज़ार शरीफ तक जाने वाले रास्ते पर हिन्दू-मुस्लिम एकता द्वार का निर्माण कराया। जिससे होकर मुस्लिम वर्ग जहां मज़ार शरीफ पर जा कर फातिहा पढ़ता व दुआये मांगता है, वही हिन्दू समाज के लोग शमशान पर जाकर अपने प्रिय का अन्तिम संस्कार करते हैं। शमशान और मज़ार को एक साथ जोड़ने वाले इस द्वार से निश्चित रूप से क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम एकता को बल मिला है।

चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

मेडिकल शोबे में कामयाबी की मिसाल कायम करने के बाद डाॅ0 मो0 अय्यूब ने वर्ष 1996 में डाॅ0 के आर आजमी, डाॅ0 गुलाम साबिर सिद्दीकी, डाॅ0 परमहंस सिंह, डाॅ0 शमीम आबिदी आदि के साथ मिलकर हाई टेक मेडिकल प्राॅडक्टस लि. कम्पनी की स्थापना की। मकसद बना, देश की माली हालत में तआवुन के साथ बेरोज़गार नौजवानों को रोजगार मुहैया कराना। गोरखपुर, दमन, काशीपुर व गुवाहाटी में स्थापित इन कम्पनियों से सिरिंज का उत्पादन शुरू हुआ और लगभग दस हज़ार बेरोजगारों को रोज़गार मिला। डाॅ0 मो0 अय्यूब की कयादत में हाई-टेक सिरिंज कम्पनी ने भी कामयाबी की इबारत लिखते हुए थोड़े ही वक्त में बाजार में पहले से मौजूद सिरिंज बनाने वाली तमाम कम्पनियों को पीछे छोड़ कर भारत की दूसरी सबसे बड़ी सिरिंज बनाने वाली कम्पनी बनने का खिताब हासिल किया। अपनी कामयाबी की इस रफ्तार को कायम रखते हुए हाई-टेक सिरिंज ने नवम्बर 2009 में भारत की पहली आॅटो डिस्पोजेबल सिरिंज (ए. डी. एस.) बाज़ार में उतार कर दक्षिण एशिया की पहली ए. डी. एस. बनाने वाली कम्पनी होने का भी मकाम हासिल किया। इसके साथ ही विभिन्न मदों में कर के तौर पर सरकार को करोड़ों रू. का सालाना टैक्स चुका कर हाईटेक सिरिंज कम्पनी मुल्क की तरक्की में भी तआवुन कर रही है।

नया लक्ष्य, नयी उड़ान, नयी मंजिल

एक डाॅक्टर के तौर पर मरीज़ को शिफा देने का काम तो वह कर सकते थे लेकिन बीमार मुल्क को ‘‘शिफा’’ देने के लिए नये रास्ते की खोज में निकल पड़े। नई संस्कृति में छुआ-छूत और भेद भाव को साथ ले कर चलने वाली दुनिया सामने थी। एक दुनिया दंगे और फसाद की भी थी। यहां देखते ही देखते मुल्क के आसमान पर धुंए के बादल मंडराने लगते थे। डाॅ0 मो0 अय्यूब ने गहराई से इस दुनिया की समीक्षा की थी। वो इस नतीजे पर पहुंचे थे कि अब इस नई और बीमार दुनिया की सर्जरी जरूरी है। यहां घूसखोरी है। जातिवाद है। फिरकापरस्ती है। मंजिल पर आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि ये हालात बदले जायें। यही रास्ता था जिससे मुल्क को शिफा मिल सकती थी। जिस रास्ते से वह काफी दूर खड़े थे। उन्होंने तहैया किया कि इस मर्ज का खात्मा जरूरी है और यह रास्ताा जो सियासत की ओर ले जाता है, पर चलना ही पड़ेगा। एक सड़ी-गली सियासत की ओर ले जाता है, पर चलना ही पड़ेगा। एक सडी-गली सियासत सामने थी और इस सियासत में वह आज़ादी के बाद की लगभग तमाम पार्टियों का ‘कारनामा’ देख चुके थे। मंजिल दुशवार थी। पहला सवाल तो यही था कि क्या उन्हें कामयाबी मिलेगी? क्या लोग उनके विचारों के साथ जुड़ना पसंद करेंगे? फिर उन्हें रवीन्द्र नाथ टैगोर की पंक्तियां याद आई। ‘‘एकला चलो रे’’ उन्हें सूफी-संतों की हिकायतें याद आईं। ‘‘आप सच के रास्ते पर चलते हैं तो अकेले होते हैं। फिर एक दुनिया आपके साथ हो जाती है।’’ अमनो-अमान के इस मुजाहिद ने इसी फिक्र के साथ पीस पार्टी की बुनियाद रखी और भारतीय राजनीति के अध्याय में एक नये अध्याय की शुरूआत कर दी। एक नया अध्याय, जहां सिर्फ रोशनी हो। लोग मिलजुल कर रहते हों। दलितों और अकलियतों का इस्तेमाल (शोषण) न होता हो। किसी कौम को शक की निगाहों से ना देखा जाता हो।

भारतीय राजनीति में ये तजुर्बा पहली बार हुआ था।

युवाओं का रोल माॅडल

आज भारतीय राजनीति में युवाओं के रोल माॅडल की बातें होती हैं। लेकिन देखा जाये तो किसी भी पार्टी का दूर तक कोई ऐसा नेता नज़र नहीं आता जो आज के युवाओं की सोच पर खरा उतर सके। डाॅ0 मो0 अय्यूब का व्यक्तित्व एक ऐसे रौशन कंदील की तरह है जिनमे से आज के युवा प्रेरणा ले सकते हैं। छोटे से कस्बे का युवक अपनी लगन और अपनी मेहनत के रास्ते न सिर्फ मेडिकल की डिग्री हासिल करता है, बल्कि उसके कदम केवल यहीं नहीं रूकते। वह सिविल सर्विस की तैयारी करता है और 1983 आई. ए. एस. (एलाइड) की परीक्षा में भी कामयाब होता है। 1984 में चिकित्सा के सर्जरी क्षेत्र में एम एस की डिग्री लेने के बाद 1985 में डाॅ0 मो0 अय्यूब की नियुक्ति कस्टम विभाग में हो जाती है। यहीं से एक ईमानदार और देश के लिए कुछ कर दिखाने का जज़्बा रखने वाले युवा मो0 अय्यूब की आंखें खुलती हैं। यहीं से परिवर्तन की आंधी उठती है और यही वो मकाम है, जहां डाॅ0 मो0 अय्यूब को लगता है कि वो आगे इस करप्ट सिस्टम का हिस्सा बन कर नहीं रह सकते। 6 महीने आई. ए. एस. एलाईड की नौकरी करने के बाद वो अपने पद से इस्तीफा दे देते हैं। अब उनके अन्दर एक ही इच्छा थी। लोगों की मदद करना। अब वो अपनी ज़िंदगी को नये मायने, नया आयाम देना चाहते थे। वो उस नौकरी को छोड़ आये थे, जो लाखों युवाओं का सपना हुआ करती है।

लेकिन समय को पता था कि इस युवा का जन्म किसी और ही मकसद के लिए हुआ है। वो अपने आप को किसी भी सीमित दायरे में कैद नहीं रख सकते थे। अब आगे की मंज़िल थी-सामाजिक भ्रष्टाचार का खात्मा कर भारत के संविधान की मूलभावना के अनुरूप ‘भारत निर्माण’ जहां जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के भेद भाव से मुक्त मानवता विकसित हो और सभी को सुरक्षा, सम्मान, न्याय व भागीदारी प्राप्त हो।

खि़ताब, सम्मान और चुनौतियां

आई. ए. एस. से इस्तीफा देने के बाद मेडिकल शोबे फिर इंडस्ट्रीयलिस्ट और सामाजिक खिदमात से कामयाबी की मिसाल कायम कर चुके डाॅ0 मो0 अय्यूब की कोशिशों के लिए उन्हें बेहद अहम सरयू रत्न सम्मान, कर्मवीर सम्मान वगैरह से नवाज़ा जा चुका है। वे आम आदमी को उसका हक दिलाने की लड़ाई तालीमी दौर से लड़ते चले आ रहे हैं। डाॅ0 मो0 अय्यूब ने साल 2007 के प्रदेश विधानसभा चुनावों में तीन दशकों से इलाके की सियासत में मजबूती से जमे हुए सियासी माफियाओं एवं दहशतपसंद लोगों को हुकूमत से बाहर कर आम आदमी को हुकूमत में भागीदारी सौंपने का फैसला लिया और एक सीधे साधे गरीब ब्राहमन परिवार के नौजवान पत्रकार राजेश त्रिपाठी को सियासत के मैदान में उतार कर दहशतपसंदों को चुनौती दे डाली। अपनी वर्षों की सत्ता हिलते देख सियासी माफियाओं ने तरह-तरह के लालच एवं धमकियों के सहारे उन्हें अपने हक में करने की कोशिश की लेकिन शुरू से ही निडर एवं मजबूत इरादे वाले डाॅ0 मो0 अय्यूब को उनके फैसले से कोई नहीं डिगा सका। इस तरह करीब 25 वर्षाें के बाद विधानसभा विल्लूपार में आम जनता की पहुंच हुकूमत के गलियारों में हुई।

देश की सियासी पार्टियों में दिनो-दिन बढ़ती फिरकापरस्ती, जातिवादिता, बदनउनवानी एवं खासतौर पर मुल्क के 25 फीसदी मुसलमानों, समाज के गरीब 29 फीसदी अतिपिछड़ों, 12 फीसदी अतिदलितों को उनकी आबादी के हिसाब से सरकारी नौकरियों, तालीम व सरकार के तरक्कियाती प्रोग्राम में हक व हिस्सेदारी के साथ इंसाफ दिलाने के लिये 2008 में पीस पार्टी की तशकील कर डाॅ0 मो0 अय्यूब ने हिन्दुस्तान की सियासत को एक नयी सोच व राह देने की शुरूआत की है। जिसमें अलगावाद, जातिवाद, फिरकापरस्ती व मसलकी तफरके की कोई जगह न हो। उनके इस मिशन को परवान चढ़ाने में सहयोगी बने डाॅ0 मुहिब्बुल हक, डाॅ0 शमीम आबिदी, डाॅ0 परमहंस सिंह, डाॅ0 जमशेद अख्तर, वाई सैमूएल, बी जेड. अंसारी, बदीउज्जमां उर्फ बादर, मकसूद अहमद, रिज़वान अहमद, सदरूल हक़ ख़ालिदी। जिनके ताआवुन से पीस पार्टी ने बदलाव का एक नया इंकेलाब खड़ा किया, जिससे देश की सियासत में एक नये ज़माने की शुरूआत नज़र आने लगी है।

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