पीस पार्टी

विचारधारा


सियासी मुतबादिल (विकल्प)

(गरीबों, मुसलमानों, अतिपिछड़ों, अतिदलितों का सियासी मुस्तक़बिल)

आज़ाद मुल्क में मुसलमान समाज के अपने हमवतन शहरियों से ज़्यादा सियासी तबादले-ख्याल, सियासी-जलसों व रैलियों में हिस्सेदारी निभाता रहा है। इलेक्शन के दिनों में सबसे ज़्यादा सियासी सरगर्मी मुस्लिम इलाकों में ही देखने को मिलती है। मुसलमान फ़िरकापरस्त ताकतों को हराने के नाम पर भाजपा को शिकस्त देने वाली नामनेहाद सेक्यूलर कांग्रेस, कम्यूनिस्ट, तृणमूल, एन.सी.पी. ए.डी.एम. के, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी को जिताता आ रहा है। उनके इलाके में अगर मुसलमान उम्मीदवार होते हैं तो वह उसे जिताने में खास तवज्जों देते हैं। चाहे वह किसी भी पार्टी का हो।

आज़ादी के बाद से आज तक मरकज़ी और सुबाई हुकूमतों में लगातार मुसलमान विधायक, संसद व मंत्री होते आये हैं, भले ही वह भाजपा की हुकूमत ही क्यों न हो। मगर आम मुसलमान हर सरकार में तअस्सुब का शिकार होता आ रहा है। चाहे सरकार भाजपा की हो या नामनेहाद दूसरी सेक्यूलर पार्टियों की। इसी का अंजाम है कि आज वह दलितों से भी बदतर हालात में पहुंच गया है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट इसकी शाहिद है। इससे यह भी साबित होता है कि मुसलमान भाइयों ने आज़ादी के बाद से आज तक जिस सियासी हिकमत व तरीके का इस्तेमाल किया है वह उन्हें मुल्क में उनका हक व इंसाफ नहीं दिला सकता।

मुसलमानों की बनिस्बत सामाजिक, तालीमी व मआशी एतेबार से पिछड़ी दूसरी कौमें व बिरादरियों को देखें, जब तक उन्होंने मुसलमानों की तर्ज पर दूसरों को जिताने-हराने का काम किया वह भी पसमांदगी के शिकार रहे और जब यही कौमें अपने समाज की क़यादत के पीछे मुत्तहिद हुए तो सरकार में भागीदार भी बने और उनकी सामाजिक, मआशी व तालीमी तरक्की का दौर भी शुरू हो गया।

मसलन-पिछड़ी बिरादरी में जब जाट चैधरी चरन सिंह जी के साथ, यादव श्री मुलायम सिंह यादव जी के साथ एकजुट हुए तो अपनी सरकार बना ली। इसी तर्ज पर जब जाटव व चमार भाईयों ने भी श्री कांशीराम जी व सुश्री मायावती जी के साथ एकजुट होकर और अपनी सरकार बना ली तो तरक्की कर जाट, यादव, जाटव व चमार भाईयों की सामाजिक, मआशी व तालीमी हैसियत मुसलमानों से बेहतर हो गयी। पिछड़े व दलित समाज की दूसरी बिरादरियां जिन्हें हुकूमत नहीं मिली, वह मआशी, तालीमी, सामाजिक ऐतबार से पिछड़ गयी और अतिपिछड़े व अतिदलित समाज बन गये। जिनका इस्तेहसाल पिछड़ों के नाम पर बनी सरकार व दलितों के नाम पर बनी बसपा की सरकार ने किया।

मुसलमानों का जहां एक तरफ मरकजी व सूबाई हुकूमतों में मज़हबी तअस्सुब की वजह से इस्तेहसाल (शोषण) वही अतिपिछड़ी व अतिदलित बिरादरियों का जाति-बिरादरी के तअस्सुब से इस्तेहसाल (शोषण) किया गया। आज मुस्लिम समाज, अतिपिछड़ा व अतिदलित समाज पसमांदगी के निचले पायदान पर है। इसे अपनी सियासी लड़ाई खुद लड़नी होगी। आज़ादी के 66 सालों में इनको इनका हक व इंसाफ नहीं मिला। आगे भी मौजूदा सियासी नेज़ाम में मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। इसलिए इस समाज को अपनी कयादत में हुकूमत बनानी होगी। अपने लिए हक व इंसाफ लेना, तरक्की कर आगे बढ़ना और समाज के हर ग़रीब व तबके को आगे बढ़ाना ही एक मात्र रास्ता है जिससे इनकी आने वाली नस्लें व हैसियत इज्ज़त व आबरू के साथ समाज के हर तबके के कंधे से कंधा मिलाकर तरक्की कर सकेंगी। इसी से हमारा सारा समाज व देश भी आगे बढ़ेगा।

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